तू ही तू है


तू ही तू है


न समजना चाहती दुनियाको,
न चाहती कोई समजे मुजको,
प्रेम रस हर दिल में है भरा,
वही पिलाना चाहती खुदको;

हर पेड़के पत्ते -पत्तेमें डाल-डालमें तू ही तू है
नफरतके काटोसे लेकर फूलोके खिलनेमें तू है

निराकार तू जो मिल गया है,
चाह नहीं आकारकी मुजको,
ऐसे दिल में बस गया तू,
आकारमें भी पाती तुजको;

प्रेम सागरकी बूंद-बूंदमे लहर-लहरमें तू ही तू है
खोजती रही में जहाँ सारा, हर दिलकी धड़कन में तू है

बिंदल सोचती प्रेमकी बूंद तेरी
मिल गई है, जिस जिसको
बिन मांगे सब मिलता उसको
अब वोह मांगे भी तो काहे को ?

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