नाटक
| नाटक पृथ्वी एक रंगमंच है जैसे उसके दोनों सिरों के बिच चल रहा एक नाटक है सत्यको महसूस करने छोड़, जिसने उसको लिखा नहीं, "तू" और "में" के साथ, "वह"भी नाटकका एक पात्र है सत्य के रूप में हो रहा नाटक है. तेरे पासमें आये हम सब, नाटक का समापन करवाने पर जिसकी रूहमें नाटक है ,उसका समापन वही शुरुआत समर्पणभाव मेरा नया नाटक है. बिंदल, क्या लिख रही है? काव्य? या शब्द सुरमाला? अपने आप के लिए? या दुसरो को दिखाने के लिए? नादान ये काव्यभी एक नाटक है. पृथ्वी एक रंगमंच है जैसे उसके दोनों सिरों के बिच चल रहा एक नाटक है |
wah........
ReplyDeleteMind blowing! Keep it up.
ReplyDelete