हे ईश्वर मेरा रोम रोम तेरा आभारी है, जितनी और जैसी दी ये जिंदगी बहुत प्यारी है। मानव देह में जीवन , मीठे संबंधों की फुलवारी है, गुरु-शिष्य के संबंध में मेरा गुरु परब्रह्म देह धारी है। नाजों से संभाला, प्यार से सिंची मुझ फूल क्यारी है। कर्म काटे और रति भर पीड़ा नहीं, तेरी लीला न्यारी है। प्रार्थना भी क्या ही करूं,करुणा सारी मुझपे वारी है, बहुत दिया है तूने प्रभु , अब ऋण चुकाने की मेरी बारी है।
प्यारी पृथ्वी सहित, दिव्य ब्रह्मांड, उनकी बिंदी के मात्र साएं है, वह जगत जननी जगदंबा ने हमारे साथ आज के क्षण बिताए है। जिसके सामने, हरी - हर नतमस्तक, जो मेरे सतगुरू का, विश्व समस्त, उनकी आंखों में डुबकी लगा, आज हम, महा कुंभ नहाए है, वह अथाह सागर से, हम ने प्रेम के अमूल्य मोती पाए हैं, वह जगत जननी जगदंबा ने हमारे साथ आज के क्षण बिताए है। साहब, मदिरा जैसे सस्ते नशे, हम नहीं करते, हम तो उनके, हास्य के नशे से भव सागर तरते, जिसका ध्यान नहीं लगता, उनके लिए ये योजना लाए है, उनकी हँसी से, आज हमने ध्यान की स्थिति के, अनुभव पाए है, वह जगत जननी जगदंबा ने हमारे साथ आज के क्षण बिताए है। प्यारी पृथ्वी सहित, दिव्य ब्रह्मांड, उनकी बिंदी के मात्र साएं है, वह जगत जननी जगदंबा ने हमारे साथ आज के क्षण बिताए है।
प्रार्थना वो है,जब शब्द से पहले अश्रु धार निकले, दुःख में ही नहीं, वो सुख में भी बारंबार निकले अपेक्षा, इच्छा जब बंधी न हो उसमें, प्रत्येक क्षण अनंत श्रद्धा से बेशुमार निकले । पुकार हो तो ऐसी की , आकर से निराकार निकले, स्वप्न सी सृष्टि में में से वो तक की राह पर झुकना ऐसे सिर्फ समर्पण से भावपार निकले। "मैं" को मिटने आत्माकी गहरी पुकार निकले , जब शब्दों से परे मौन से ही करी जाती हो, सहस्त्रार से प्रभु के प्रेम की रस धार निकले।
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