में बनूँगी उसकी प्रतिकृति वो है दिव्य शक्ति और में बनूँगी उसकी भक्ति न वो मुझसे अलग न में उनसे अलग बरस रहा है प्यार कोई डूब गया तो कइयोंको नहीं इसकी भनक वो मेरा मधुबन और में बनूंगी उसकी कलि महेकती शब्द नही है कोई बाकि कैसे करु उसकी जाखी वो तो समज लेगा मुझे मौन लिख दू इतना है काफी वो है पूरा काव्य और में बनूंगी उसकी पहली वाली पंक्ति सारे तारे गिन लिए कुछ हसीन चुन लिए गिनती शुरू उसके सिर से ख़त्म होने पर चरण छू लिये वो हे दिव्य ब्रह्मांड और में बनूंगी उसकी धरती चमकती होजाये उसकी एक हंसी मोक्ष की मिलजाए रस्सी उसके जीवन को पीना है जेसे कोई ठंडी वाली लस्सी वो है मेरा दर्पण में बनूँगी उसकी प्रतिकृति |
आभार गुरुदेव
हे ईश्वर मेरा रोम रोम तेरा आभारी है, जितनी और जैसी दी ये जिंदगी बहुत प्यारी है। मानव देह में जीवन , मीठे संबंधों की फुलवारी है, गुरु-शिष्य के संबंध में मेरा गुरु परब्रह्म देह धारी है। नाजों से संभाला, प्यार से सिंची मुझ फूल क्यारी है। कर्म काटे और रति भर पीड़ा नहीं, तेरी लीला न्यारी है। प्रार्थना भी क्या ही करूं,करुणा सारी मुझपे वारी है, बहुत दिया है तूने प्रभु , अब ऋण चुकाने की मेरी बारी है।
Wow...so beautiful..!
ReplyDeletethQ :)
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