| जीवन समर्पण जीवन ऐसा रह गया है जैसे पानी रखा हो मुठीमें जितना जी सकता है जीले, सरक जायेगा चुटकीमें बचपन अपना साकार करले, दिलको उसके प्रेमसे भरले बचपन यु ही न बीत जाये,गीली रहती लंगोटी में सरगम सजाले उसकी योवन तेरा सतरंगी करले योवन तेरा न बीत जाये सोने-चाँदी वाली अंगूठीमें बुढ़ापेमें पायेगा उसको? क्या थाम सकेगा उसका हाथ पलमे? समर्पणतो युवानीका खेल हे बाबु उसको सास सासमें भरले वरना लड्डू तेरे नामके बट न जाये, बेटेकी तिन दिनकी छुट्टीमें. |
आभार गुरुदेव
हे ईश्वर मेरा रोम रोम तेरा आभारी है, जितनी और जैसी दी ये जिंदगी बहुत प्यारी है। मानव देह में जीवन , मीठे संबंधों की फुलवारी है, गुरु-शिष्य के संबंध में मेरा गुरु परब्रह्म देह धारी है। नाजों से संभाला, प्यार से सिंची मुझ फूल क्यारी है। कर्म काटे और रति भर पीड़ा नहीं, तेरी लीला न्यारी है। प्रार्थना भी क्या ही करूं,करुणा सारी मुझपे वारी है, बहुत दिया है तूने प्रभु , अब ऋण चुकाने की मेरी बारी है।
Comments
Post a Comment